
नक्सलियों की बंदूकों से नहीं डरे बस्तर के इस आदिवासी नेता ने, साथियों की जान बचाने के लिए खुद को नक्सलियों के सामने किया पेश—झीरम घाटी में शहादत ने अमर कर दिया नाम।
बस्तर। कुछ नाम सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि किसी पूरी पीढ़ी के संघर्ष, साहस और दर्द की पहचान बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में महेंद्र कर्मा ऐसा ही एक नाम है।
बस्तर की धरती ने उन्हें सिर्फ एक राजनेता के रूप में नहीं देखा। आदिवासी समाज के बीच उनकी अलग पहचान थी। उनके समर्थकों ने उन्हें प्यार से ‘बस्तर टाइगर’ की उपाधि दी। नक्सलवाद के खिलाफ उनकी बेबाक आवाज, आदिवासी समाज में उनकी मजबूत पकड़ और राजनीतिक दबदबे ने उन्हें ऐसा चेहरा बना दिया था, जिससे माओवादी संगठन सबसे ज्यादा खौफ खाते थे।
और फिर आया 25 मई 2013।
झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले को घेर लिया। गोलियों और बारूदी विस्फोटों से बस्तर की वादियां दहल उठीं। काफिले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई बड़े नेता मौजूद थे।
इस खूनी हमले का सबसे बड़ा निशाना था—महेंद्र कर्मा।
गोलियों की बौछार के बीच खड़ा था एक ‘टाइगर’
25 मई की वह शाम आज भी बस्तर के राजनीतिक इतिहास में सिहरन पैदा करती है।
सुकमा में कार्यक्रम खत्म होने के बाद कांग्रेस नेताओं का काफिला जगदलपुर की ओर लौट रहा था। झीरम घाटी के घने जंगलों के बीच पहुंचते ही नक्सलियों ने पहले से बिछाए गए जाल को सक्रिय कर दिया।
विस्फोट हुआ।
इसके बाद चारों तरफ से गोलियों की बौछार शुरू हो गई।
काफिले में अफरा-तफरी मच गई। हमलावर एक-एक कर लोगों को निशाना बनाने लगे। उन्हें तलाश थी उस चेहरे की, जो वर्षों से बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ सबसे मुखर आवाजों में शामिल था।
महेंद्र कर्मा।
कई वर्षों से नक्सलियों के निशाने पर रहे कर्मा जानते थे कि उस दिन उनकी जान बचना बेहद मुश्किल है। लेकिन भय ने उनके कदम नहीं रोके।
उनसे जुड़े कई विवरणों में यह बात सामने आती है कि उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के बजाय सामने आकर कहा—
“मैं महेंद्र कर्मा हूं।”
इसके बाद नक्सलियों ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया और उनकी हत्या कर दी।
महेंद्र कर्मा की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी। यह बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ उठ रही एक बड़ी राजनीतिक आवाज को खामोश करने की कोशिश थी।
क्यों नफरत करते थे नक्सली महेंद्र कर्मा से?
इस सवाल का जवाब महेंद्र कर्मा के पूरे राजनीतिक जीवन में छिपा है।
वे ऐसे दौर में बस्तर की राजनीति में उभरे, जब माओवादी संगठन धीरे-धीरे ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे।
कर्मा खुद आदिवासी समाज से आते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
वे जानते थे कि बस्तर के जंगलों में रहने वाले आदिवासी समाज की समस्याएं क्या हैं और नक्सली किस तरह उन परिस्थितियों का फायदा उठाकर अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई।
यहीं से माओवादियों और महेंद्र कर्मा के बीच सीधा टकराव शुरू हुआ।
जन जागरण से सलवा जुडूम तक—नक्सलियों के खिलाफ खुली चुनौती
1990 के दशक में महेंद्र कर्मा ने नक्सलियों के खिलाफ जन जागरण अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य ग्रामीण आदिवासी समाज को नक्सली प्रभाव के खिलाफ संगठित करना था।
इसके बाद वर्ष 2005 में सलवा जुडूम आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित अध्याय बना।
सलवा जुडूम के जरिए बड़ी संख्या में स्थानीय आदिवासियों को नक्सलियों के खिलाफ खड़ा किया गया। कई स्थानीय युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी यानी SPO के रूप में भी जोड़ा गया।
इस अभियान को लेकर बाद में गंभीर विवाद हुए। मानवाधिकार संगठनों ने इसके दौरान हिंसा और विस्थापन के आरोप लगाए और इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठे।
लेकिन राजनीतिक रूप से एक बात स्पष्ट थी—
महेंद्र कर्मा ने माओवादी प्रभाव को खुली चुनौती दे दी थी।
वे नक्सलियों के उस दावे को चुनौती देते थे कि वे आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
यही कारण था कि माओवादी संगठन की नजर में कर्मा सिर्फ एक राजनेता नहीं रह गए थे।
वे उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके थे।
CPI से राजनीति शुरू की, कांग्रेस में बने बस्तर का बड़ा चेहरा
महेंद्र कर्मा की राजनीतिक यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं थी।
बस्तर के फरसपाल गांव से आने वाले कर्मा ने राजनीति की शुरुआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से की थी। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए।
वे विधायक बने।
लोकसभा पहुंचे।
छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री रहे।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली।
लेकिन पदों से कहीं ज्यादा उनकी पहचान बनी—बस्तर के आदिवासी समाज के प्रभावशाली नेता के रूप में।
बस्तर के दूरदराज इलाकों में उनका प्रभाव इतना मजबूत था कि समर्थक उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपने समाज की आवाज मानते थे।
इसी लोकप्रियता और उनके निर्भीक व्यक्तित्व के कारण उन्हें ‘बस्तर टाइगर’ कहा जाने लगा।
‘टाइगर’ इसलिए नहीं कि वे ताकतवर थे, बल्कि इसलिए कि वे पीछे नहीं हटते थे
महेंद्र कर्मा की राजनीति का सबसे बड़ा गुण था—उनका बेबाक अंदाज।
नक्सलवाद के खिलाफ बोलने में उन्होंने कभी संकोच नहीं किया।
वे नक्सलियों से हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की अपील करते थे, लेकिन साथ ही उनके हिंसक आंदोलन का राजनीतिक विरोध भी करते थे।
बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नक्सलियों के खिलाफ खुलकर खड़ा होना आसान नहीं था।
कर्मा के लिए यह सिर्फ राजनीति नहीं थी।
यह उनके सामने खड़ी एक ऐसी चुनौती थी, जिसका सामना उन्होंने अपने तरीके से किया।
झीरम घाटी ने छीन लिया बस्तर का सबसे बड़ा आदिवासी चेहरा
25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए हमले ने छत्तीसगढ़ की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
महेंद्र कर्मा के साथ तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता मारे गए।
काफिले पर हुए इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया।
लेकिन इस नरसंहार में सबसे अधिक जिस नाम को निशाना बनाया गया, वह था—
महेंद्र कर्मा।
जिस व्यक्ति ने वर्षों तक नक्सलवाद के खिलाफ आवाज उठाई, आखिरकार उसी संघर्ष की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
महेंद्र कर्मा की शहादत ने परिवार को भी बदल दिया
महेंद्र कर्मा की हत्या के बाद उनके परिवार ने भी राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अपनी भूमिका जारी रखी।
उनकी पत्नी देवती कर्मा ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और दंतेवाड़ा से विधायक भी चुनी गईं।
कर्मा परिवार लंबे समय से बस्तर की राजनीति और नक्सल विरोधी संघर्ष से जुड़ा रहा है।
इस परिवार के लिए महेंद्र कर्मा सिर्फ पति, पिता या परिवार के मुखिया नहीं थे।
वे उस संघर्ष की पहचान थे, जिसमें उन्होंने अपनी जान गंवाई।
13 साल बाद भी जिंदा है ‘बस्तर टाइगर’ का नाम
महेंद्र कर्मा को दुनिया से गए 13 साल से ज्यादा समय हो चुका है।
लेकिन बस्तर में उनका नाम आज भी लिया जाता है।
किसी के लिए वे नक्सलवाद के खिलाफ खड़े होने वाले निर्भीक आदिवासी नेता हैं।
किसी के लिए वे सलवा जुडूम के सबसे बड़े चेहरे हैं।
और उनके परिवार व समर्थकों के लिए वे आज भी वही ‘बस्तर टाइगर’ हैं, जिसने आखिरी सांस तक अपने संघर्ष से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
झीरम की उस शाम ने महेंद्र कर्मा को हमसे छीन लिया, लेकिन उनकी कहानी को नहीं।
क्योंकि कुछ मौतें अंत नहीं होतीं—वे इतिहास में एक ऐसी कहानी छोड़ जाती हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियां पढ़ती हैं।
महेंद्र कर्मा की कहानी भी ऐसी ही कहानी है।
एक आदिवासी नेता की।
एक बेबाक राजनेता की।
नक्सलवाद के खिलाफ खड़े एक चेहरे की।
और बस्तर के उस ‘टाइगर’ की, जिसकी दहाड़ उसकी शहादत के बाद भी सुनाई देती है।
झीरम का जख्म आज भी ताजा है
5 सितंबर 2026 को झीरम घाटी हत्याकांड से जुड़े मामले में NIA की विशेष अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। हालांकि यह फैसला पीड़ित परिवारों और कांग्रेस के लिए संतोष का विषय नहीं बना है और मामले को लेकर सवाल अब भी उठ रहे हैं।
लेकिन झीरम की कहानी किसी एक अदालती फैसले से कहीं बड़ी है।
उस कहानी के केंद्र में आज भी महेंद्र कर्मा हैं—‘बस्तर टाइगर’।
टाइगर अभी भी जिंदा है
आसान नहीं है इतने बड़े व्यतित्व को शब्दों से सजाना लेकिन एक कोशिश है कि बस्तर टाइगर की कहानी आने वाली पीढी के दिलों में भी जिंदा रहे।
डीएम सोनी
