11 रुपये का IV सेट 325 रुपये में! महाराष्ट्र FDA की जांच के बाद उठे अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल
जनहित विशेष | मरीज और परिजन कैसे समझें बिल का असली गणित, अनावश्यक खर्च से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी सावधानियां
महाराष्ट्र :-अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज और उसके परिजन अक्सर डॉक्टर की फीस, कमरे का किराया, जांच और दवाइयों के खर्च पर ही सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं। लेकिन इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स—जैसे सीरिंज, सुई, आईवी सेट, कैन्युला और कैथेटर—का खर्च भी अस्पताल के बिल में जुड़ता है। इन सामानों की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच कितना अंतर है, इसकी जानकारी आमतौर पर परिजनों को नहीं होती।
हाल ही में महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के एक सर्वे में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की ट्रेड कीमत और प्रिंटेड एमआरपी के बीच बड़े अंतर का मामला सामने आया है। इस खुलासे ने अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था, पारदर्शिता और मरीजों से वसूले जाने वाले शुल्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
FDA सर्वे में सामने आया चौंकाने वाला अंतर
महाराष्ट्र FDA के कमिश्नर तुकाराम मुंढे के अनुसार, सर्वे के दौरान कुछ अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और उनके पैकेट पर छपी एमआरपी के बीच 2,841 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।
सर्वे में सामने आए उदाहरणों के अनुसार—
ध्यान दें: ये आंकड़े FDA सर्वे में बताए गए ट्रेड मूल्य और प्रिंटेड एमआरपी के उदाहरण हैं। ट्रेड कीमत, एमआरपी और अस्पताल द्वारा मरीज से वसूले गए वास्तविक शुल्क अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल इन आंकड़ों के आधार पर किसी अस्पताल की अंतिम बिलिंग को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
मरीज के बिल में कैसे बढ़ता है खर्च?
इलाज के दौरान कई ऐसी वस्तुएं इस्तेमाल होती हैं, जिन्हें मरीज या उसके परिजन सामान्यतः दवाइयों की तरह अलग से नहीं खरीदते। इनमें शामिल हैं—
- IV सेट और इंफ्यूजन सेट
- सीरिंज और सुई
- IV कैन्युला
- कैथेटर
- नेब्युलाइजर किट
- ड्रेसिंग सामग्री और अन्य डिस्पोजेबल मेडिकल सामान
इन वस्तुओं की संख्या, उपयोग और कीमत बिल में अलग-अलग दर्ज हो सकती है। समस्या तब सामने आती है, जब परिजन यह नहीं जान पाते कि सामान की वास्तविक कीमत क्या थी, अस्पताल ने किस दर पर उसे खरीदा और मरीज से किस आधार पर शुल्क लिया गया।
यही वह जगह है, जहां बिलिंग में पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है।
FDA ने उठाए अहम सवाल
महाराष्ट्र FDA के सर्वे में सामने आए अंतर के बाद यह सवाल उठाया गया कि यदि कोई मेडिकल कंज्यूमेबल कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसके पैकेट पर कई गुना अधिक एमआरपी दर्ज है, तो इस अंतर का लाभ किसे मिल रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, FDA ने इस मामले को नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के समक्ष रखा है और खरीद कीमत तथा एमआरपी के बीच अंतर को लेकर जांच की मांग की है। केंद्र सरकार की ओर से भी NPPA से इस विषय पर रिपोर्ट मांगे जाने की बात सामने आई है।
क्या हर अधिक कीमत पर लिया गया सामान ‘लूट’ है?
यह समझना जरूरी है कि मेडिकल कंज्यूमेबल की खरीद कीमत और अस्पताल के बिल में दर्ज कीमत एक जैसी होना आवश्यक नहीं है। अस्पताल के खर्च में स्टाफ, स्टोरेज, नसबंदी, लॉजिस्टिक्स, उपयोग, प्रशासनिक लागत और अन्य सेवाएं शामिल हो सकती हैं।
लेकिन मरीज को बिल में स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि किस वस्तु के लिए कितना शुल्क लिया गया है। यदि किसी वस्तु की कीमत असामान्य रूप से अधिक लगती है, तो मरीज या उसके परिजन को उसका आधार पूछने का अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।
सवाल केवल कीमत का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और उचित जानकारी का भी है।
अस्पताल के बिल की जांच कैसे करें?
मरीजों के लिए जरूरी संदेश
अस्पताल में इलाज कराना मजबूरी नहीं, बल्कि जरूरत होती है। ऐसे समय में मरीज और उसके परिजन मानसिक तनाव में रहते हैं और हर खर्च की बारीकी से जांच करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अस्पतालों की जिम्मेदारी है कि वे बिलिंग में स्पष्टता रखें और मरीजों को खर्च का उचित विवरण उपलब्ध कराएं।
वहीं, मरीजों को भी बिना झिझक “यह शुल्क किस चीज का है?”, “कितनी मात्रा इस्तेमाल हुई?”, “इसकी कीमत इतनी क्यों है?” जैसे सवाल पूछने चाहिए।
जागरूक मरीज, पारदर्शी बिलिंग और जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था—इसी से इलाज के खर्च को लेकर भरोसा मजबूत हो सकता है।
