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छत्तीसगढ़ :- 20 KM पैदल निकलीं 100 छात्राएं, बोलीं—पहले बिजली दो, फिर पढ़ाई की बात करो!

सरगुजा के एकलव्य स्कूल में बुनियादी सुविधाओं के लिए छात्राओं का संघर्ष; एक महीने से बिजली गुल, सफाई व्यवस्था भी बदहाल। 

सरगुजा। कहावत है कि प्यासे को कुएं तक जाना पड़ता है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल यह है कि जब प्यास बुनियादी सुविधाओं की हो और सामने व्यवस्था मौजूद हो, तो आखिर नागरिकों को ही उसके दरवाजे तक क्यों पहुंचना पड़े?

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में सामने आई एक घटना ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बतौली ब्लॉक के शिवपुर स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की 100 से अधिक छात्राएं स्कूल में बुनियादी सुविधाओं की कमी से परेशान होकर जिला मुख्यालय अंबिकापुर में कलेक्टर से मिलने के लिए करीब 20 किलोमीटर पैदल मार्च पर निकल पड़ीं।

एक महीने से बिजली गुल, छात्राएं परेशान
छात्राओं के मुताबिक, विद्यालय और हॉस्टल में पिछले करीब एक महीने से बिजली की समस्या बनी हुई है। इसके अलावा सफाई व्यवस्था भी बदहाल होने की बात सामने आई। लगातार परेशानी झेलने के बाद छात्राओं ने जब अपनी समस्याएं स्कूल प्रबंधन के सामने रखीं, तो उन्हें अपेक्षित समाधान नहीं मिला।

बताया गया कि छात्राओं ने अपनी समस्याओं को लेकर अधिकारियों तक पहुंचने का फैसला किया। उन्होंने अंबिकापुर जाकर कलेक्टर से सीधे मुलाकात करने की ठानी। जब छात्राएं सच में सड़क पर उतरीं तो मचा हड़कंप शुरुआत में छात्राओं के पैदल अंबिकापुर जाने के फैसले को शायद गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन जब करीब 100 छात्राएं वास्तव में हॉस्टल से निकलकर पैदल मार्च पर आगे बढ़ने लगीं, तो प्रशासनिक अमले में हलचल मच गई।

जिस समस्या को समय रहते स्कूल स्तर पर सुलझाया जा सकता था, वह देखते ही देखते प्रशासन की चिंता का विषय बन गई। यह घटना सिर्फ एक विद्यालय की अव्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या सरकारी व्यवस्था में अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए छात्राओं को 20 किलोमीटर पैदल चलकर जिला मुख्यालय तक पहुंचना पड़ेगा?
सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर बड़ा सवाल
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं।

 उनके लिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था केवल विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद होती है।
ऐसे में यदि आवासीय विद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में बिजली, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए विद्यार्थियों को आवाज उठानी पड़े, तो सामान्य सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शिक्षा किसी भी राजनीतिक दल या सरकार के लिए आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ी जिम्मेदारी है। स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को किताबें, शिक्षक और कक्षाओं के साथ-साथ सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण, बिजली, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है।
व्यवस्था को छात्राओं तक पहुंचना चाहिए था
सरगुजा की इन छात्राओं का पैदल मार्च एक बड़ा संदेश छोड़ गया है—जब शिकायत करने वालों को ही अपनी आवाज सुनाने के लिए व्यवस्था तक पहुंचना पड़े, तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठना लाजिमी है।

बेहतर प्रशासन वही है जो समस्या के बढ़ने का इंतजार न करे, बल्कि समस्या लेकर बैठे लोगों तक खुद पहुंचे।
सरगुजा की छात्राओं का यह 20 किलोमीटर का सफर सिर्फ एक पैदल मार्च नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था के सामने खड़ा एक सीधा सवाल है—क्या अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बेटियों को इतनी दूर तक चलना ही पड़ेगा?

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